क्या काशीपुर से सियासी दांव खेलने की तैयारी में हैं अरविंद पांडेय? वर्तमान राजनीति पर विकास गुप्ता की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

गदरपुर से मोहभंग, काशीपुर में बढ़ती दिलचस्पी और नए राजनीतिक संकेत

काशीपुर ( विकास गुप्ता)।उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों अगर कोई नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, तो वह है गदरपुर विधायक व पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय। तल्ख बयानों, सत्ता के खिलाफ खुली नाराज़गी और शक्ति प्रदर्शन के जरिए उन्होंने यह साफ कर दिया है कि वह अब डिफेंस मोड में नहीं, बल्कि अटैक मोड में हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यह आक्रामकता आत्मविश्वास की निशानी है या भीतर ही भीतर पनप रहे राजनीतिक असुरक्षा भाव का परिणाम?
खिचड़ी पॉलिटिक्स और भीतरघात का डर
हाल ही में गदरपुर स्थित अपने आवास पर समर्थकों की भीड़ जुटाकर अरविंद पांडेय ने जिस तरह खिचड़ी पॉलिटिक्स के बहाने शक्ति प्रदर्शन किया, उसका संदेश साफ था—
“मुझे कमजोर समझने की भूल न की जाए।” परंतु इसी प्रदर्शन के पीछे एक डर भी साफ झलकता है— आगामी विधानसभा चुनाव में भीतरघात का डर। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पांडेय को यह आशंका सता रही है कि गदरपुर सीट अब उनके लिए पहले जैसी सुरक्षित नहीं रही। संगठन के भीतर बढ़ती गतिविधियां, समानांतर नेतृत्व को खड़ा करने की कोशिशें और सत्ता के शीर्ष से दूरी—इन सबने उनके मन में सवाल पैदा कर दिए हैं कि क्या 2027 में गदरपुर से जीत दोहराना संभव होगा?


बाजपुर से गदरपुर तक का सियासी सफर
अरविंद पांडेय राजनीति के कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद उन्होंने बाजपुर सीट से राजनीति की शुरुआत की, जहां 2002 और 2007 में लगातार दो बार विधायक बनकर अपनी दबंग छवि स्थापित की। लेकिन 2008 के परिसीमन ने उनकी राह बदल दी—बाजपुर सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। राजनीतिक मजबूरी में उन्होंने गदरपुर का रुख किया और यहां भी जनता ने भाजपा को पहली बार भरोसा जताते हुए उन्हें विजयी बनाया। 2012 और 2017 में लगातार जीत ने उन्हें पार्टी का मजबूत स्तंभ बना दिया और 2017 में वह शिक्षा मंत्री बने।
धामी के उदय के बाद बदली सियासत
अरविंद पांडेय का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा था, तभी भाजपा हाईकमान ने प्रदेश की कमान युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी को सौंप दी। शुरुआत में दोनों के रिश्ते सहज रहे, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। भाजपा की जीत के बावजूद धामी की खटीमा सीट से हार और उसके बाद भी उनका दोबारा मुख्यमंत्री बनना—
यहीं से पांडेय पर भीतरघात के आरोपों की फुसफुसाहट शुरू हुई। नतीजा यह हुआ कि अरविंद पांडेय मंत्रिमंडल से बाहर हो गए और सियासी तल्खियां खुलकर सामने आने लगीं।
गदरपुर में तैयार हो रहा समानांतर नेतृत्व
इसी बीच गदरपुर में युवा नेता गुंजन सुखीजा का कद तेजी से बढ़ने लगा। संगठन में पहले जिलाध्यक्ष और अब प्रदेश मंत्री बनकर गुंजन ने खुद को गदरपुर की राजनीति में वैकल्पिक चेहरे के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया। पंजाबी बाहुल्य गदरपुर सीट पर गुंजन की बढ़ती पकड़ ने अरविंद पांडेय की चिंता बढ़ा दी। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह बढ़त कोई संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है—जिसका मकसद पांडेय को गदरपुर में कमजोर करना है।
काशीपुर: नया सियासी ठिकाना?
यहीं से कहानी काशीपुर की ओर मुड़ती है।बीते कुछ समय से अरविंद पांडेय की काशीपुर के मुद्दों में असामान्य रुचि, वहां लगातार मौजूदगी और स्थानीय समस्याओं को लेकर सरकार को घेरना—सब कुछ किसी बड़े राजनीतिक संकेत की ओर इशारा कर रहा है। खासतौर पर गगन कांबोज जैसे युवाओं की सक्रिय टीम का साथ मिलना यह बताता है कि काशीपुर में पांडेय के लिए जमीन तैयार की जा रही है। पुराने राजनीतिक संपर्कों को दोबारा साधने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं।
दीपक बाली की नसीहत और खुला संदेश
इस पूरे घटनाक्रम के बीच काशीपुर के मेयर दीपक बाली का अरविंद पांडेय पर खुला हमला और नसीहत बहुत कुछ कह जाती है। यह बयान सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस राजनीतिक बेचैनी का संकेत है जो काशीपुर में पांडेय की बढ़ती सक्रियता से पैदा हो रही है। संकेत साफ हैं, फैसला बाकी राजनीतिक विश्लेषकों की राय में, अरविंद पांडेय गदरपुर को लेकर अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और काशीपुर को एक सेफ पॉलिटिकल ऑप्शन के रूप में गंभीरता से टटोल रहे हैं।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि—
क्या अरविंद पांडेय काशीपुर से चुनाव लड़ेंगे?
सवाल यह है कि—
अगर उन्होंने काशीपुर का दांव खेला, तो उत्तराखंड भाजपा की अंदरूनी राजनीति किस भूचाल से गुजरेगी?
क्योंकि यह सिर्फ सीट बदलने की कहानी नहीं…
यह सत्ता, संगठन और नेतृत्व की बड़ी लड़ाई का अगला अध्याय है।

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