जब परंपरा बनी प्रसाद: होली पर गुजिया बनाने की आस्था भरी कहानी क्यों दीवाने हैं लोग काशीपुर के कुंदन स्वीट्स की खास गुजिया के? जानिए होली और गुजिया का धार्मिक संबंध


काशीपुर (तनीषा गुप्ता)।रंगों के पर्व होली की रौनक चारों ओर छाने लगी है। फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव इस वर्ष 3 मार्च को मनाया जाएगा। खुशियों और उमंग के इस त्योहार पर जहां रंग-गुलाल का उल्लास रहता है, वहीं रसोई से उठती गुजिया की खुशबू माहौल को और खास बना देती है। दरअसल, गुजिया सिर्फ मिठाई नहीं बल्कि होली की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है — ऐसी पहचान जिसके बिना त्योहार अधूरा माना जाता है।
विदेशी प्रेरणा से भारतीय परंपरा तक
इतिहासकारों के अनुसार लोकप्रिय भारतीय मिठाई गुजिया की जड़ें पूरी तरह स्वदेशी नहीं हैं। माना जाता है कि इसका विचार मध्य-पूर्व से आया और तुर्किए की मशहूर मिठाई बकलावा से प्रेरित है। बकलावा मैदे की परतों में ड्राई फ्रूट्स, शहद और चीनी भरकर बनाई जाती थी और कभी शाही परिवारों तक सीमित थी। इसी अवधारणा से प्रेरित होकर भारत में गुजिया का रूप विकसित हुआ।
इतिहास में गुजिया का उल्लेख 13वीं शताब्दी में मिलता है, जब इसे सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए बनाया जाता था। समय के साथ इसमें बदलाव हुए और आज की खोया-मेवा भरी पारंपरिक गुजिया का स्वरूप सामने आया।
बुंदेलखंड से पूरे देश तक सफर
ऐसी मान्यता है कि भारत में सबसे पहले गुजिया बुंदेलखंड क्षेत्र में बनाई गई थी। वहीं से यह मिठाई राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार होते हुए पूरे देश में लोकप्रिय हो गई। शुरुआत में मैदा और खोया से बनी गुजिया स्थानीय व्यंजन थी, लेकिन धीरे-धीरे यह त्योहारों की शान बन गई।
होली से जुड़ाव की कहानी
गुजिया का होली से रिश्ता धार्मिक परंपरा से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि होली पर गुजिया बनाने की परंपरा वृंदावन से शुरू हुई, जहाँ स्थित राधा रमण मंदिर में सबसे पहले भगवान कृष्ण को मीठी भरावन भरी लोई का भोग लगाया गया। बताया जाता है कि 16वीं सदी में यह परंपरा शुरू हुई और धीरे-धीरे पूरे देश में होली के साथ गुजिया का चलन जुड़ गया।
स्वाद से ज्यादा परंपरा का प्रतीक
आज गुजिया सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि उत्सव, परिवार और परंपरा का प्रतीक है। हर घर में अलग-अलग अंदाज़ से बनाई जाने वाली यह मिठाई होली के रंगों में मिठास घोलती है और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती है।
होली और गुजिया का रिश्ता इतिहास, संस्कृति और स्वाद तीनों का अनोखा मेल है। विदेशी प्रेरणा से शुरू हुई यह मिठाई अब भारतीय त्योहारों की पहचान बन चुकी है — खासकर होली की, जहाँ हर रंग के साथ एक मीठा कौर भी जुड़ा होता है।
काशीपुर में खास है गुजिया का स्वाद
होली के इस पावन अवसर पर काशीपुर में भी गुजिया की मिठास लोगों के उत्साह को दोगुना कर रही है। शहर की प्रसिद्ध मिठाई दुकान कुंदन स्वीट्स पर इन दिनों विभिन्न प्रकार की गुजिया की खास बिक्री हो रही है। शुद्ध देशी घी से तैयार की गई ये गुजिया स्वाद और गुणवत्ता के कारण ग्राहकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। खोया, मेवा और पारंपरिक मसालों से बनी इन गुजियों का स्वाद लोगों को इतना भा रहा है कि त्योहार से पहले ही बड़ी संख्या में लोग इन्हें खरीदने पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि होली की असली मिठास तभी पूरी होती है जब थाली में ताज़ा, सुगंधित और घर जैसा स्वाद देने वाली गुजिया शामिल हो।

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