
“संस्कारों की विरासत और सेवा की मिसाल — बाबूराम जी के पुत्र आनंद व अनिल दे रहे हैं समाजसेवा को नया आयाम”
काशीपुर ( विकास गुप्ता)। पौराणिक एवं प्राचीन काशीपुर नगर की धरती हमेशा से सेवा, संस्कार और समर्पण की गवाह रही है। ऐसे ही एक नाम थे — स्व. बाबूराम जी, जो रियल एस्टेट जगत के सफल कारोबारी होने के साथ-साथ एक संवेदनशील, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति थे। मां बाल सुंदरी देवी के अनन्य भक्त बाबूराम जी ने 2015 में जब समाज की जरूरतों को समझते हुए गरीब और जरूरतमंद कन्याओं के सामूहिक विवाह कराने का बीड़ा उठाया, तब यह सिर्फ एक आयोजन नहीं था — यह एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत थी।
22 नवंबर 2015
चैती मेला परिसर में जब पहली बार संस्था बाल सुंदरी परिणय सेवा संस्था के माध्यम से 21 कन्याओं का विवाह हुआ, तो काशीपुर ने देखा कि कैसे एक व्यक्ति का संकल्प सैकड़ों परिवारों के जीवन में खुशियां भर सकता है। वह दिन, वह आयोजन आज भी कइयों की आंखों में ताज़ा है।
कोरोना काल और बाबूराम जी का विछोह
कोरोना महामारी के कठिन समय में बाबूराम जी का आकस्मिक निधन न सिर्फ परिवार के लिए बल्कि काशीपुर समाज के लिए भी एक बड़ी क्षति थी। लेकिन उनके जाने के बाद जो सबसे सुंदर बात उभर कर आई, वह थी उनके संस्कारों की जीवित विरासत — उनके दोनों पुत्रों आनंद कुमार और अनिल कुमार के रूप में।
सेवा का व्रत, पिता की राह
पिता के अधूरे संकल्प को पूरा करना कोई सामान्य बात नहीं होती, लेकिन आनंद और अनिल ने इसे अपना कर्तव्य नहीं, बल्कि धार्मिक जिम्मेदारी समझा। वे न केवल इस संस्था को पहले जैसी ही निष्ठा से चला रहे हैं, बल्कि हर वर्ष विवाह संख्या और व्यवस्था में भी सुधार कर रहे हैं। अब तक संस्था 150 से अधिक कन्याओं का विवाह करा चुकी है — यह आँकड़ा नहीं, आशीर्वादों की माला है।
आगामी आयोजन — 1 नवंबर, देव उठान एकादशी
इस बार संस्था 1 नवंबर 2025 को देव उठान एकादशी के पावन अवसर पर 31 कन्याओं का सामूहिक विवाह आयोजित करने जा रही है। यह आयोजन न केवल उन कन्याओं के लिए एक नवजीवन की शुरुआत होगा, बल्कि बाबूराम जी की आत्मा के लिए भी सच्ची श्रद्धांजलि होगा।
बाबूराम जी की सोच, पुत्रों के कर्म
आज काशीपुर में जब लोग आनंद और अनिल की तारीफ करते हैं, तो साथ ही बाबूराम जी को भी याद करते हैं —
“जिन्होंने ऐसे बेटे दिए, जिनमें सेवा नहीं, संस्कार भी जिंदा हैं।”
इन दोनों भाइयों की कार्यशैली, व्यवहार, और समाज के प्रति समर्पण देखकर हर कोई यही कहता है —
“बाबूराम जी चले जरूर गए, पर उनका उजाला इन दो पुत्रों में अब भी जल रहा है।”
✨ एक प्रेरणा, एक परंपरा
बाल सुंदरी परिणय सेवा संस्था अब एक नाम नहीं, एक परंपरा बन चुकी है — सम्मान के साथ बेटियों को विदा करने की परंपरा, संस्कारों को निभाने की परंपरा, और समाज में समानता की परंपरा।
काशीपुर गर्व करता है उन हाथों पर जो अपने पिता की छाया बनकर, दूसरों के जीवन में रौशनी बाँट रहे हैं।
और यही है सच्ची श्रद्धांजलि —
जब संकल्प से सेवा बन जाए, और बेटा, पिता का सपना जीने लगे। 🌺